समुद्र को आहंकार नहीं है कि वो विशाल है नदियों के जल को कभी नहीं कहता कि तुम्हें मेरी जरूरत है मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं समुद्र तो बाद बाहे फ़हलाए सभी नदियों को अपने आप मे समाहित करने मे विलंब नहीं करता न देखता है गंदगी न देखता है रंग रूप बस सभी को स्वीकार करता जला जा रहा है ॥ इसी तरह हम भी अपनी जीवन मे नदी कि भांति यात्राए कर शेष मे परम पिता परमेशवर जो सभी के पालन करता है जन्म दाता है और समय पर जीवन आयु पूर्ण होने पर मोक्ष दाता है भगवान बिष्णु के धाम सभी को जा कर समाहित होना है l

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