Wednesday, June 10, 2020

hari prapt

Ojoswi's Two Cents: Krishna in his Vishwaroopसमुद्र को आहंकार नहीं है कि वो विशाल  है नदियों के जल को कभी नहीं कहता कि तुम्हें मेरी जरूरत है मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं समुद्र तो बाद बाहे फ़हलाए सभी नदियों को अपने आप मे समाहित करने मे विलंब नहीं करता न देखता है गंदगी न देखता है रंग रूप बस सभी को स्वीकार करता जला जा रहा है ॥
इसी तरह हम भी अपनी जीवन मे नदी कि भांति यात्राए कर शेष मे परम पिता परमेशवर जो सभी के पालन करता है जन्म दाता है और समय पर जीवन आयु पूर्ण होने पर मोक्ष दाता है भगवान बिष्णु के धाम सभी को जा कर समाहित होना है l 
    इस लिए जीवनकाल मे किए गए कर्तव्यो और कर्म का बंधन  रख कर वासुदेव को अर्पण से किए कर्म मे उत्पन्न दोष समाप्त होते  सदा के लिए मोक्ष को प्राप्त कर वैकुंठ मे श्री  हरी के चरण मिलता है अत मनुष्य को कर्म के उपरांत     कर्म  का त्याग   कर देना  चाहिए 

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